
जो सम-सुक्ख-णिलीणु बुहु, पुण पुण अप्पु मुणेइ
कम्मक्खउ करि सो वि फुडु, लहु णिव्वाणु लहेइ ॥93॥
लीन समसुख जीव बारम्बार ध्याते आतमा
वे कर्म क्षयकर शीघ्र पावें परमपद परमातमा ॥
अन्वयार्थ : [जो सम-सुक्ख-णिलीणु बुहु] जो ज्ञानी समता रुपी सुख में लीन [पुण पुण अप्पु मुणेइ] पुनः पुनः आत्मा को जानता है, [कम्मक्खउ करि सो वि फुडु] स्पष्टत: वह ही कर्मों का क्षय करके [लहु णिव्वाणु लहेइ] शीघ्र निर्वाण को प्राप्त करता है ।