
जो अप्पा सुद्धु वि मुणइ, असुइ-सरीर-विभिण्णु
सो जाणइ सत्थइँ सयल, सासय-सुक्खहँ लीणु ॥95॥
इस अशुचि-तन से भिन्न आतमदेव को जो जानता
नित्य सुख में लीन बुध वह सकल जिनश्रुत जानता ॥
अन्वयार्थ : [जो अप्पा सुद्धु वि] जो आत्मा को शुद्ध ही [असुइ-सरीर-विभिण्णु] अशुचि शरीर से अत्यन्त भिन्न [मुणइ] मानता है, [सो जाणइ सत्थइँ सयल] वही सारे शास्त्रों को जानता है और [सासय-सुक्खहँ लीणु] शाश्वत सुख में लीन होता है ।