
जो णवि जाणइ अप्पु परु, णवि परभाउ चएइ
सो जाणउ सत्थइँ सयल, ण हु सिवसुक्खु लहेइ ॥96॥
जो स्व-पर को नहीं जानता छोड़े नहीं परभाव को
वह जानकर भी सकल श्रुत शिवसौख्य को ना प्राप्त हो ॥
अन्वयार्थ : [जो णवि जाणइ अप्पु परु] जो स्व और पर को नहीं जानता और [णवि परभाउ चएइ] परभावों का त्याग नहीं करता है, [सो जाणउ सत्थइँ सयल] वह सर्वशास्त्रों को जानने पर भी, [ण हु सिवसुक्खु लहेइ] मोक्ष-सुख को प्राप्त नहीं करता ।