
वज्जिय सयल-वियप्पइँ परम-समाहि लहंति
जं विंदहिं साणंदु क वि सो सिव-सुक्ख भणंति ॥97॥
सब विकल्पों का वमन कर जम जाय परम समाधि में
तब जो अतीन्द्रिय सुख मिले शिवसुख उसे जिनवर कहें ॥
अन्वयार्थ : [वज्जिय सयल-वियप्पइँ] समस्त विकल्पों से रहित होकर [परम-समाहि लहंति] परम-समाधि को प्राप्त कर, [जं विंदहिं साणंदु क वि] उस समय जिस आनन्द का अनुभव होता है [सो सिव-सुक्ख भणंति] उसे मोक्ष-सुख कहा है ।