+ आत्म-ध्यान चार प्रकार का -
जो पिंडत्थु पयत्थु बुह, रूवत्थु वि जिण-उत्तु
रूवातीतु मुणेहि लहु, जिम परु होहि पवित्तु ॥98॥
पिण्डस्थ और पदस्थ अर रूपस्थ रूपातीत जो
शुभ ध्यान जिनवर ने कहे जानो कि परमपवित्र हो ॥
अन्वयार्थ : [बुह] हे ज्ञानी ! [जिण-उत्तु] जिनेन्द्र द्वारा कथित [जो पिंडत्थु पयत्थु बुह] जो पिण्डस्थ, पदस्थ [रूवत्थु वि], रूपस्थ और [रूवातीतु] रूपातीत (ध्यान) है [मुणेहि] उनको जानो [जिम] जिससे [लहु] शीघ्र ही [परु होहि पवित्तु] परम पवित्र हो जाओ ।