
सव्वे जीवा णाणमया, जो सम-भाव मुणेइ
सो सामाइउ जाणि फुडु, जिणवर एम भणेइ ॥99॥
राय-रोस ये परिहरिवि, जो समभाउ मुणेइ
सो सामाइउ जाणि फुडु, केवलि एम भणेइ ॥100॥
'जीव हैं सब ज्ञानमय' इस रूप जो समभाव हो
है वही सामायिक कहें जिनदेव इसमें शक न हो ॥
जो राग एवं द्वेष के परिहार से समभाव हो
है वही सामायिक कहें जिनदेव इसमें शक न हो ॥
अन्वयार्थ : [सव्वे जीवा णाणमया] सब जीव ज्ञानमय हैं, [जो सम-भाव मुणेइ] ऐसा जानकर जो समता भाव रखता है [सो सामाइउ जाणि फुडु] उसे सामायिक होता है, ऐसा स्पष्ट जानो [जिणवर एम भणेइ] जिनवर देव ऐसा कहते हैं ।
[राय-रोस ये परिहरिवि] राग और द्वेष दोनों को छोड़कर [जो समभाउ मुणेइ] जो समभाव धारण किया जाता है, [सो सामाइउ जाणि फुडु] वही सामायिक है, ऐसा स्पष्ट जानो [केवलि एम भणेइ] केवलज्ञानी ऐसा कहते हैं ।