+ छेदोपस्थापना चारित्र कथन -
हिंसादिउ-परिहारु करि, जो अप्पा हु ठवेइ
सो बियऊ चारित्तु मुणि, जो पंचम-गइ णेइ ॥101॥
हिंसादि के परिहार से जो आत्म-स्थिरता बढ़े
यह दूसरा चारित्र है जो मुक्ति का कारण कहा ॥
अन्वयार्थ : [हिंसादिउ-परिहारु करि] हिंसादि का त्याग करके [जो अप्पा हु ठवेइ] जो आत्मा में स्थिर होता है, [सो बियऊ चारित्तु मुणि] उसके दूसरा (छेदोपस्थापना) चारित्र होता है, [जो पंचम-गइ णेइ] जो पंचम गति में ले जाता है ।