तन्न यतः सदवस्था: सर्वा आम्रेड़ितं यथा वस्तु ।
न तथा ताभ्य: प्रथगिति किमपि हि सत्ताकमन्तरं वस्तु ॥119॥
नियतं परिणामित्वादुत्पादव्ययमया य एवं गुणा: ।
टङ्कोत्कीर्णन्यायात्त एव नित्या यथा स्वरूपतवात् ॥120॥
न हि पुनरेकेषामिह भवति गुणानां निरन्वयो नाश: ।
अपरेषामुत्पादो द्रव्यं यत्तद्‌-द्वयाधारम् ॥121॥
दृष्टान्ताभासोऽयं स्याद्धि विपक्षस्य मृत्तिकायां हि ।
एके नश्यन्ति गुणा जायन्ते पाकजा गुणास्त्वन्ये ॥122॥
तत्रोत्तरमिति सम्यक्‌ सत्यां तत्र च तथाविधायां हि ।
किं पृथिवीत्वं नष्टं न नष्टमथ चेत्तथा कथं न स्यात्‌ ॥123॥
अन्वयार्थ : सो यह बात भी नहीं है, क्योंकि सत् की सर्व अवस्थाएं आम्रेडित (वही-वही) होकर जैसे वस्तु कहलाती हैं, वैसे उनसे प्रथक्‌ (भिन्न) सत्तावाली दूसरी वस्तु नहीं है ॥११९॥
अतएव जितने भी गुण हैं वे सभी परिणमनशील होने से जिसप्रकार उत्पाद-व्ययस्वरूप हैं उसी प्रकार टंकोत्कीर्ण न्याय से अपने स्वरूप में स्थिर रहने के कारण वे नित्य भी हैं ॥१२०॥
किन्तु प्रकृत में ऐसा नहीं है कि किन्हीं गुणों का सर्वथा नाश होता है और दूसरे गुणों का उत्पाद होता है तथा द्रव्य उन दोनों प्रकार के गुणों का आधार है ॥१२१॥
जो गुणों का नाश और उत्पाद मानते है उनके उक्त कथन की पुष्टि में यह कहना कि 'मिट्टी में पहले गुण तो नष्ट हो जाते हैं और पाकज दूसरे गुण उत्पन्न होते हैं', दृष्टान्ताभास है ॥१२२॥
इसका समीचीन उत्तर यह है कि उस मिट्टी के पकते समय क्या उसके मिट्टीपने का नाश हो जाता है ? यदि मिट्टीपने का नाश नहीं होता है तो उस समय वह पृथ्वीत्व गुणवाली क्यों न मानी जाय ? ॥१२३॥