
ननु च स्वावसरे किल सर्ग: सर्गेकलक्षणत्वात् स्यात् ।
संहारः स्वावसरे स्यादिति संहारलक्षणत्वाद्वा ॥232॥
ध्रौव्यं चात्मावसरे भवति ध्रौव्यैकलक्षणात्तस्य ।
एवं लक्षणभेदः स्याद्बीजाङ्कुरपादपत्त्ववत्त्वितिचेत् ॥233॥
अन्वयार्थ : उत्पाद अपने समय में होता है, क्योंकि उसका उत्पन्न होना यही एक लक्षण है । व्यय अपने समय में होता है, क्योंकि नाश को प्राप्त होना यह उसका लक्षण है । तथा ध्रौव्य अपने समय में होता है, क्योंकि उसका ध्रुव रहना यही एक लक्षण है । इस प्रकार बीज, अंकुर और वृक्ष के समान इन तोनों में क्षणभेद सिद्ध हो जाता है । शंका का आशय यह है कि जिस प्रकार बीज, अंकुर और वृक्ष ये भिन्न-भिन्न समय में होते हैं उसी प्रकार उत्पाद, व्यय ओर ध्रौव्य, ये भी भिन्न-भिन्न समय में होते हैं -- ऐसा मानना चाहिये ?