
भवति विरुद्धं हि तदा यदा सतः केवलस्य तत्त्रितयम् ।
पर्ययनिरपेक्षत्वात् क्षणभेदोपि च तदैव सम्भवति ॥241॥
यदि वा भवति विरुद्धं तदा यदाप्येकपर्ययस्य पुनः ।
अस्त्युत्पादो यस्य व्ययोपि तस्यैव तस्य वै ध्रौव्यम् ॥242॥
अन्वयार्थ : यदि पर्यायों की अपेक्षा किये बिना केवल सत् के ये तीनों होते तो उस समय प्रकृत कथन विरुद्ध होता और उसी समय उनका कालभेद भी सम्भव होता ।
अथवा जिस समय जिस पर्याय का उत्पाद होता है उसी समय उसका व्यय और ध्रौव्य भी उसी का माना जाता तो यह बात विरोध को प्राप्त होती ।