
प्रकृतं सतो विनाश: केनचिदन्येन पर्ययेण पुनः ।
केनचिदन्येन पुन: स्यादुत्पादो ध्रुवं तदन्येन ॥243॥
संदृष्टि पादपवत् स्वयमुत्पन्नः सदङ्कुरेण यथा ।
नष्टो बीजेन पुनर्ध्रुवमित्युभयत्र पादपत्वेन ॥244॥
न हि बीजेन विनष्टः स्यादुत्पन्नश्च तेन बीजेन ।
ध्रौव्यं बीजेन पुनः स्यादित्यध्यक्षपक्षबाध्यत्वात् ॥245॥
उत्पादव्यययोरपि भवति यदात्मा स्वयं सरेवेति ।
तस्मादेतद्-द्वयमपि वस्तु सदेवेति नान्यदस्ति सत: ॥246॥
पर्यायादेशत्वादस्त्युत्पादो व्ययोऽस्ति च ध्रौव्यम् ।
द्रव्यार्थादेशत्वान्नाप्युत्पादो व्ययोऽपि न धौव्यम् ॥247॥
अन्वयार्थ : किन्तु प्रकृत में ऐसा माना है कि किसी अन्य पर्याय के द्वारा सत् का विनाश होता है तथा किसी अन्य पर्याय के द्वारा उसका उत्पाद होता है और इनसे भिन्न किसी अन्य धर्मरूप से उसका ध्रौव्य होता है ।
प्रकृत में वृक्ष का दृष्टान्त उपयोगी है जैसे कि वृक्ष अंकुररूप से स्वयं उत्पन्न होता है और बीजरूप से नष्ट होता है तथापि वृक्षरूप से वह दोनों अवस्थाओं में ध्रुव रहता है ।
किन्तु ऐसा नहीं है कि वृक्ष बीजरूप से ही तो नष्ट होता हो, उसी बीजरूप से वह उत्पन्न होता हो और उसी बीजरूप से वह ध्रुव भी रहता हो, क्योंकि ऐसा मानने पर इसमें प्रत्यक्ष से बाधा आती है ।
हां, यह बात सही है कि उत्पाद और व्यय इन दोनों का आत्मा स्वयं सत् ही है, इसलिये ये दोनों सद्रूप ही हैं, सत से भिन्न नहीं हैं ।
सारांश यह है कि पर्यायार्थिक नय से उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य ये तीनों हैं, किन्तु द्रव्यार्थिक नय से न उत्पाद है, न व्यय है और न ध्रौव्य है ।