
तत्र विवक्ष्यो भाव: केवलमस्ति स्वभावमात्रतया ।
अविवक्षितपरभावाभावतया नास्ति सममेव ॥285॥
सर्वत्र क्रम एष द्रव्ये क्षेत्रे तथाऽथ काले च ।
अनुलोमप्रतिलोमैरस्तीति विवक्षितो मुख्य: ॥286॥
संदृष्टि: पटभाव: पटसारों वा पटस्य निष्पत्तिः ।
अस्त्यात्मना च तदितरघटादिभावाऽविवक्षया नास्ति ॥287॥
अन्वयार्थ : अब इनमें जो भाव विवक्षित होता है वह केवल स्वभावरूप से है और जो भाव अविवक्षित होता है वह परभाव होने से उस समय नहीं है ।
उदाहरणार्थ -- जो भी पट का भाव पट का सार या पट की निष्पत्ति है । इसमें जो विवक्षित होता है उसरूप से वह है और इससे भिन्न परादि भावों की विवक्षा नहीं होने से उसरूप से वह नहीं है ।
सर्वत्र अर्थात् नित्य अनित्य आदि शेष तीन युगलों में द्रव्य, क्षेत्र का और भाव की अपेक्षा यही क्रम जानना चाहिये । इसमें अनुलोम और प्रतिलोम क्रम से जो विवक्षित होता है वह मुख्य हो जाता है ।