
अपि चैवं प्रक्रियया नेतव्या: पञ्चशेषभङ्गाश्च ।
वर्णवदुक्तद्वयमिह पटवच्छेषास्तु तद्योगात् ॥288॥
अन्वयार्थ : इस प्रकार अस्ति नास्ति आदि चारों युगलों की अपेक्षा दो भंग कहे । शेष पाँच भंग भी इसी प्रक्रिया से जान लेना चाहिये । इन सातों भंगों में दो भंग वर्ण-स्थानीय कहे गये हैं । किन्तु शेष पाँच भंग इनके सम्बन्ध से बनते हैं अतः वे पद-स्थानीय जानना चाहिये ।