
ननु चान्यतरेण कृतं किमथ प्रायः प्रयासभारेण ।
अपि गौरवप्रसंगादनुपादेयाच्च वाखिलसितत्वात् ॥289॥
अस्तीति च वक्तव्यं यदि वा नास्तीति तत्त्वसंसिद्ध्यै ।
नोपादानं पृथगिह युक्तं तदनर्थकादिति चेत् ॥290॥
अन्वयार्थ : अस्ति और नास्ति इनमें से किसी एक के मानने से काम चल जाता है, दोनों को सिद्ध करने का प्रयत्न करने से क्या प्रयोजन है, क्योंकि ऐसा करने से गौरव दोष आता है और कहने की चतुराई मात्र होने से वह उपादेय भी नहीं है । इसलिये तत्त्व की भले प्रकार से सिद्धि करने के लिये या तो केवल विधि का ही कथन करना ठीक है या केवल निषेध का ही कथन करना ठीक दे । दोनों का अलग भंग ग्रहण करना युक्त नहीं है, क्योंकि इनका अलग अलग ग्रहण करना अनर्थक ठहरता है ?