
तन्न यतः सर्वं स्वं तदुभयभावाध्यवसितमेवेति ।
अन्यतरस्य विलोपे तदितरभावस्य निह्नवापत्ते: ॥291॥
स यथा केवलमन्वयभात्रं वस्तु प्रतीयमानोपि ।
व्यतिरेकाभावे किल कथमन्वयसाधकश्च स्यात् ॥292॥
अन्वयार्थ : यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि सभी पदार्थ विधि-निपेधरूप भाव से युक्त हैं । यदि इन दोनों में से किसी एक का लोप माना जाता है तो उससे भिन्न दूसरे भाव को भी लुप्त होने की आपत्ति आती है ।
विधि और निषेध में से किसी एक के नहीं मानने पर शेष दूसरे के अभाव का प्रसंग इस प्रकार आता है कि यदि वस्तु केवल अन्वय रूप है ऐसी प्रतीत मानी जाय तो यह व्यतिरेक के अभाव में अन्वय की साधक कैसे हो सकती है ?