
तन्न यतः सदिति स्यादद्वैतं द्वैतभावभागपि च ।
तत्र विधौ विधिमात्रं तदिह निषेधे निषेधमात्रं स्यात् ॥299॥
नहिं किंचिद्विधिरुपं किञ्चित्तच्छेषतो निषेधांशम् ।
आस्तां साधनमस्मिन्नाम द्वैतं न निर्विशेषत्वात् ॥300॥
अन्वयार्थ : यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि सत् यह द्वैतरूप होकर भी कथंचित् अद्वैत रूप ही है, इसलिये जब विधि की विवक्षा होती है तब वह विधिमात्र प्राप्त होता है और जब निषेध की विवक्षा होती है तब वह निषेधमात्र प्राप्त होता है ।
ऐसा नहीं है कि कुछ भाग विधिरूप है और उससे बचा हुआ कुछ भाग निषेधरूप है क्योंकि ऐसे सत् की सिद्धि सें साधन का मिलना तो दूर रहो, उसमें द्वैत की कल्पना भी नहीं की जा सकती है क्योंकि वह अशेष विशेषों से रहित माना गया है ।