
अपि च निषिद्धत्वे सति नहि वस्तुत्वं विधेरभावत्वात् ।
उभयात्मकं यदि खलु प्रकृतं न कथं प्रमीयेत् ॥302॥
अन्वयार्थ : ऐसा भी नहीं है कि द्रव्यांतर की तरह विधि, निषेध, दोनों ही सर्वथा भिन्न हों, सर्वथा नाम भेद भी इनमें बाधित ही है, क्योंकि सर्वथा विधि को कहने से वस्तु सर्वथा विधिमात्र ही हो जाती है, बाकी के विशेष लक्षणों का उसमें अभाव ही हो जाता है । उसीप्रकार सर्वथा निषेध को कहने से उसमें विधि का अभाव हो जाता है। इन दोनों के सर्वथा भेद में वस्तु की वस्तुता ही चली जाती है । यदि वस्तु को उभयात्मक माना जाय तो प्रकृत की सिद्धि हो जाती है ।