तस्मद्विधिरूपं वा निर्दिष्टं सन्निषेधरूपं वा ।
संहत्यान्यतरत्वादन्यतरे सन्निरूप्यते तदिह ॥303॥
अन्वयार्थ :
जब यह बात सिद्ध हो चुकी कि पदार्थ विधि-निषेधात्मक है, तब वह कभी विधिरूप कहा जाता है, और कभी निषेधरूप कहा जाता है ।