दृष्टान्तोऽत्र पटत्वं यावन्निर्दिष्टमेव तन्तुतया ।
तावन्न पटो नियमाद्‌ दृश्यन्ते तन्‍तवस्तथाऽध्यक्षात्‌ ॥304॥
यदि पुनरेव पटत्व॑ तदिह तथा दृश्यते न तन्तुतया ।
अपि संग्रह्य समन्‍तात्‌ पटोयमिति दृश्यते सद्भिः ॥305॥
अन्वयार्थ : दृष्टान्त के लिये पट है। जिससमय पट तन्‍तु की दृष्टि से देखा जाता है, उससमय वह पट प्रतीत नहीं होता, किन्तु तन्‍तु ही दृष्टिगत होते हैं । यदि वही पट पटबुद्धि से देखा जाता है, तो वह पट ही प्रतीत होता है, उस समय वह तन्‍तुरूप नहीं दिखता ।