अयमर्थो विधिरेव हि युक्तिवशात्स्पात्स्वयं निषेधात्मा ।
अपि च निषेधस्तद्विधिरूपः स्यात्स्वयं हि युक्तिवशात्‌ ॥307॥
अन्वयार्थ : ऊपर कहे हुए कथन का खुलासा अर्थ यह है कि विधि ही युक्ति के वश से स्वयं निषेधरूप हो जाती है । और जो निषेध है, वह भी युक्ति के वश से स्वयं विधिरूप हो जाता है ।