
इति विन्दन्निह तत्त्वं जैन: स्यात्कोऽपि तत्त्ववेदीति ।
अर्थात्स्यात्स्याद्वादी तदपरथा नाम सिंहमाणवक: ॥308॥
अन्वयार्थ : ऊपर कही हुई रीति के अनुसार जो कोई तत्त्व का ज्ञाता तत्त्व को जानता है, वही जैन है, और वही वास्तविक स्याद्वादी है । यदि ऊपर कही हुई रीति से तत्त्व का स्वरूप नहीं जानता है, तो वह स्याद्वादी नहीं है किन्तु उसका नाम सिंहमाणवक है ।