+ सत् ध्रुव होता हुआ भी विवक्षित समय में है अविवक्षित समय में नहीं, ऐसा कैसे? -
ननु सदिति स्थायि यथा सदिति तथा सर्वकालसमयेषु ।
तत्र विवक्षितसमये तत्स्यादथवा न तदिदमिति चेत्‌ ॥309॥
अन्वयार्थ : सत्‌ ध्रुवरूप से रहता है, इसलिये वह सम्पूर्ण काल के सभी समयों में रहता है, फिर आप (जैन) यह क्‍यों कहते हैं कि वह सत्‌ विवक्षित समय में ही है, अविवक्षित समय में वह नहीं है ?