नैवं यतो विशेष: समयात्परिणमति वा न नित्यादौ ।
तदतद्भावविचारे परिणामो विसदृशोऽथ सदृशो वा ॥312॥
अन्वयार्थ : उपर्युक्त शंका ठीक नहीं है क्योंकि नित्य अ्नित्य में और तद्भाव अतद्भाव में अवश्य भेद है। भेद भी यह है कि नित्य, अनित्य पक्ष में तो वस्तु के समय-समय में होनेवाले परिणमन का ही विचार होता है, वहाँ पर 'समान परिणाम हैं या असमान हैं, इसका विचार नहीं होता है, परन्तु तद्भाव, अतद्भाव पक्ष में यह विचार होता है कि जो वस्तु में परिणमन हो रहा है, वह सदृश है अथवा विसदृश है ।