
ननु सन्नित्यमनित्यं कथंचिदेतावतैव तत्सिद्धि: ।
तत्किं तदतद्भावाभावविचारेण गौरवादिति चेत् ॥313॥
अन्वयार्थ : सत् कथंचित् नित्य है और कथंचित् अनित्य है केवल इतने मात्र से ही सदृश और विसदृश परिणाम की सिद्धि हो जाती है फिर यहाँ तत् और अतत् के सद्भाव और असद्भाव के विचार से क्या प्रयोजन है, क्योंकि इस विचार से तो केवल गौरव दोष आता है ?