नैवं तदतद्भावाभावविचारस्य निह्ववे दोषात्‌ ।
नित्यानित्यात्मनि सति सत्यपि न स्यात्‌ क्रियाफलं तत्त्वम्‌ ॥314॥
अन्वयार्थ : ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्‍योंकि तत्‌-अतत्‌ के भावाभाव विचार का लोप करने पर यह दोष आता हे कि सत्‌ के नित्यानित्यात्मक होने पर भी उसमें तत्‌ अतत्‌ भाव के माने बिना क्रिया, फल और तत्त्व की सिद्धि नहीं हो सकती है ।