+ सर्वथा नित्य पक्ष में दोष -
अयमर्थो यदि नित्यं सर्वं सत्‌ सर्वथेति किल पक्षः ।
न तथा कारणकार्ये, कारकसिद्धिस्तु विक्रियाभावात्‌ ॥315॥
अन्वयार्थ : आशय यह है कि 'सम्पूर्ण सत् केवछ नित्य है' यदि यह पक्ष स्वीकार किया जाता है तो इसके स्वीकार करने पर किसी भी प्रकार की क्रिया नहीं बनती और इसके अभाव में कारण, कार्य और कारक इनमें से किसी की भी सिद्धि नहीं होती है ।