
यदि वा सदानित्यं स्यात्सर्वस्वं सर्वथेति किल पक्षः ।
न तथा क्षणिकत्वादिह क्रियाफलं कारकाणि तत्त्वं च ॥316॥
अन्वयार्थ : अथवा 'सम्पूर्ण सत् केवल अनित्य है' यदि यह पक्ष स्वीकार किया जाता है तो इसके स्वीकार करने पर क्षणिकत्व का प्रसंग आता है । जिससे क्रियाफल, कारक और तत्त्व इनमें से किसी की भी सिद्धि नहीं होती है ।