+ केवल नित्यानित्यात्मक पक्ष में दोष -
अपि नित्यानित्यात्मनि सत्यपि सति वा न साध्यसंसिद्धिः ।
तदतद्भावाभावैर्विना न यस्माद्विशेषनिष्पत्तिः ॥317॥
अन्वयार्थ : यदि सत्‌ को केवल नित्यानित्यात्मक माना जाता है तो भी साध्य की सिद्धि नहीं हो सकती है, क्योंकि तत् अतत्‌ का भावाभाव माने बिना पदार्थों में जो भेद प्रतीत होता है वह नहीं हो सकता है ।