अथ तद्यथा यथा सत्परिणममानं यदुक्तमस्तु तथा ।
भवति समीहितसिद्धिर्विना न तदतद्विवक्षया हि यथा ॥318॥
अन्वयार्थ : अब यदि सत्‌ का जैसा परिणमन होता है वह वैसा ही कहा जाय, ऐसा यदि चाहते हो तो तत् अतद्भाव को स्वीकार कर लेना चाहिये, क्योंकि तत् अतद्भाव की विवक्षा किये बिना समीहित की सिद्धि नहीं हो सकती है ।