
अपि परिणममानं सन्नतदेतत् सर्वथाऽन्यदेवेति ।
इति पूर्वपक्षः किल विना तदेवेति दुर्निवारः स्पात् ॥319॥
अपि परिणतं यथा सद्दीपशिखा सर्वथा तदेव यथा ।
इति पूर्वपक्षः किल दुर्वारः स्याद्विना न तदिति नयात् ॥320॥
अन्वयार्थ : 'परिणमन करता हुआ सत् वह नहीं है जो पहले था किन्तु उससे सर्वथा भिन्न ही है' इस प्रकार का किया गया पूर्व पक्ष तत् पक्ष को स्वीकार किये बिना दूर नहीं किया जा सकता है ।
इसी प्रकार 'परिणमन करता हुआ सत् दीप-शिखा के समान सर्वथा वही है' ऐसा किया गया पूर्व-पक्ष अतत् पक्ष को स्वीकार किये बिना भी दूर नहीं किया जा सकता है ।
इसलिये सत् नित्यानित्य के समान तद्तद्रूप है ऐसा मान लेना चाहिये, क्योंकि किसी एक के माने बिना प्रत्यक्ष से इच्छित अर्थ की सिद्धि नहीं हो सकती है ।