
ननु भवति सर्वथैव हि परिणामो विसदृशोऽथ सदृशो वा ।
ईहितसिद्धिस्तु सतः परिणामित्त्वाद्यथाकथश्चिद्वै ॥322॥
अन्वयार्थ : परिणाम सर्वथा सदृश या विसदृश किसी प्रकार का भी होता रहे, इसमें तत् अतद्भाव के नहीं मानने से कुछ भी हानि नहीं है, क्योंकि इच्छित अर्थ की सिद्धि तो सत् को कथंचित् परिणामों मान लेने से हो जाती है ?