तन्‍न यतः परिणामः सन्नपि सदृशैकपक्षतो न तथा ।
न समर्थश्चार्थकृते नित्यैकान्तादिपक्षवत्‌ सदृशात्‌ ॥323॥
नापीष्टः संसिद्ध्यै परिणामो विसदृशैकपक्षात्म: ।
क्षणिकैकान्तवदसतः प्रादुर्भावात्‌ सतो बिनाशाद्वा ॥324॥
एतेन निरस्तोऽभूत् क्‍लीवत्वादात्मनो ऽपराद्वतया ।
तदतद्भावाभावापन्हववादी विबोध्यते त्वधुना ॥325॥
अन्वयार्थ : यह कहना ठीक नहीं है, क्‍योंकि परिणाम होकर भी वह सदृशात्मक होता है ऐसा एक पक्ष मानने से कोई लाभ नहीं, क्‍योंकि नित्यैकान्त आदि पक्ष के समान सदृश परिणाम के मानने पर भी वह कार्य करने में समर्थ नहीं हो सकता है ।
इसी प्रकार सर्वथा विसदृश परिणाम के मानने पर भी वह कार्यसिद्धि में समर्थ नहीं हो सकता है; क्‍योंकि जैसे क्षणिकैकान्त पक्ष के मानने पर असत्‌ की उत्पत्ति ओर सत्‌ के विनाश का प्रसंग आता है । वैसे ही सर्वथा विसदृश पक्ष के मानने पर भी उत्त दोष आते हैं ।
इस प्रकार इतने कथन द्वारा तदतद्भाव का अपलाप करनेवाला व्यक्ति क्लीव होने से स्वयं अपने अपराध के कारण निरस्त हो जाता है। अब उसे समझाते हैं ।