तदतद्भावनिबद्धो यः परिणामः सतः स्वभावतया ।
तद्दर्शनमधुना किल दृष्टान्तपुरस्सरं वक्ष्ये ॥326॥
जीवस्य यथा ज्ञानं परिणामः परिणमंस्‍तदेवेति ।
सदृशस्योद्दाह्रतिरिति जातेरनतिक्रमत्वतो वाच्या ॥327॥
यदि वा तदिह ज्ञानं पारिणामः परिणमन्न तदिति यतः ।
स्वावसरे यत्सत्त्वं तदसत्त्वं परत्र नययोगात्‌ ॥328॥
अन्नापि च संदृष्टिः सन्ति च परिणामतोपि कालांशाः ।
जातेरनतिक्रमतः सदृशत्वनिबन्धना एव ॥329॥
अपि नययोगाद्विसदृशसाधनसिद्ध्यै त एव कालांशाः ।
समयः समयः समयः सोपीति बहुप्रतीतित्वात्‌ ॥330॥
अतदिदमिदप्रतीदों क्रियाफल कारकाणि द्वेतुरिति ।
तदिदं स्यादिह संविदि हि हेतुस्तत्त्वं हि चेन्मिथः प्रेम ॥ 331॥
अयमर्थ: सदसद्वत्तदतदपि च विधिनिषेधरूपं स्यात्‌ ।
न पुननिरपेक्षतया तद्-द्वयमपि तत्त्वमुभयतया ॥332॥
अन्वयार्थ : वस्तु का तद्भाव ओर अतद्भाव से युक्त जो स्व|भाविक परिणमन होता है उसका इस समय दृष्टान्त पूर्वक विचार करते हैं ॥३२६॥
यथा-जीव का ज्ञान परिणाम परिणमन करता हुआ सदा वही रहता है । इसमें ज्ञानत्व जाति का कभी भी उल्लंघन नहीं होता है । यह तद्भाव का उदाहरण है ॥३२७॥
तथा वही ज्ञान परिणाम परिणमन करता हुआ बदल जाता है, क्‍योंकि विवक्षित परिणाम का अपने समय में जो सत्व है वह पर्यायार्थिक नय की अपेक्षा से अन्य समय में नहीं है । यह अतद्भाव का उदाहरण है ॥३२८॥
इसका विशेष खुलासा इस प्रकार है कि परिणमनशील जितने भी कालांश हैं वे सब अपनी जाति का उल्लंघन नहीं करने के कारण तद्भाव के ही कारण हैं ॥३२९॥
तथा वे ही काल के अंश पर्यायार्थिक नय की अपेक्षा से अतद्भाव के भी कारण है क्‍योंकि उनमें प्रथम समय, द्वितीय समय और तृतीय समय इत्यादि रुप से अनेक समयों की प्रतीति होती है ॥३३०॥
प्रकृत में 'यह वह नहीं है' इस प्रकार की प्रतीति का कारण क्रियाफल और कारक हैं । तथा 'यह वही है' इस प्रकार की प्रतीति का कारण तत्त्व है । किन्तु यह बात तभी बनती है जब इन दोनों में परस्पर सापेक्षभाव माना जाय ॥३३१॥
आशय यह है कि सत् और असत् की तरह तत्‌ और अतत्‌ भी विधि निषेधरूप होते हैं । पर निरपेक्षपने से वे दोनों तत्त्वरूप नहीं हैं किन्तु परस्पर सापेक्षपने से ही ये दोनों तत्त्वरूप हैं ॥३३२॥