रूपनिदर्शनमेतत्तदिति यदा केवलं विधिर्मुख्यः ।
अतदिति गुणो पृथक्त्वाटन्मात्रं निरवेशतया ॥333॥
अतदिति विधिर्विवक्ष्यो मुख्य:स्यात्‌ केवलं यदादेशात्‌ ।
तदिति स्वतो गुणत्वादविवक्षितमित्यतन्मात्रम् ॥334॥
अन्वयार्थ : खुलासा इस प्रकार है कि जिस समय 'तत्‌' इस रूप से केवल विधि मुख्य होता है उस समय तत्‌ का अविनाभावी होने से 'अतत' गौण हो जाता है । इसलिये पूरी तरह से वस्तु तन्मात्न प्राप्त होती है ॥३३३॥
तथा जिस समय केवल 'अतत' का कथन करना विवक्षित होता है उस समय पर्यायार्थिक नय की अपेक्षा से वह मुख्य हो जाता है और 'तत्' यह स्वतः गौण हो जाने से अविवक्षित हो जाता है, इसलिये उस समय वस्तु अतन्मात्र प्राप्त होती है ॥३३४॥