+ क्या सत्‌ और परिणाम दो नाम और सव्येतर गोविषाण के समान हैं? -
अथ किमनेकार्थत्वादेकं नामद्वयान्कितं किंचित् ।
अग्निर्वैश्वानर इव सव्येतरगोविषाणवत्‌ किमथ ॥345॥
अन्वयार्थ : या ऐसा है क्या कि जिस प्रकार एक ही पदार्थ नाना प्रयोजन होने से अग्नि और वैश्वानर (जठराग्नि) के समान दो नामों से अंकित होता है उसी प्रकार सत्‌ और परिणाम भी क्या नाना प्रयोजन होने से एक ही वस्तु के दो नाम हैं ? या जिस प्रकार दाएँ और बाएँ सींग होते हैं उसी प्रकार क्या सत्‌ और परिणाम हैं ?