+ क्या सत् और परिणाम कनकोपल के समान हैं? -
अथ किं कनकोपलवत्‌ किंचित्स्वं किंचिदस्वमेव यतः ।
ग्राह्यं स्वं सारतया तदितरमस्वं तु हेयमसारतया ॥352॥
अन्वयार्थ : अथवा सत्‌ और परिणाम दोनों में कनक पाषण के समान क्या एक स्वरूप है ओर दूसरा पररूप है और इस प्रकार साररुप होने से स्व ग्राह्य है ओर दूसरा पररूप असाररूप होने से अग्राह्य है ?