+ क्या सत् और परिणाम अपूर्ण-न्याय के समान हैं? -
अथ किमुदासीनतया वक्तव्यं वा यथारुचित्वान्न ।
यदपूर्णन्यायादप्यन्यतरेणेह साध्यसंसिद्धे: ॥355॥
अन्वयार्थ : अथवा सत् और परिणाम इनका कथन रुचिपूर्वक न करके उदासीनता पूर्वक किया जाता है; क्‍योंकि पदपूर्ण नयाय के अनुसार इनमें से किसे एक के द्वारा ही साध्य की सिद्धि हो जाती है ?