
अथ किमुपादानतया स्वार्थं सृजीत कंचिदन्यतमः ।
अपरः सहकारितया प्रकृतं पुष्णाति मित्रवत्तदिति ॥356॥
अन्वयार्थ : अथवा कोई एक उपादान कारण होकर अपने कार्य को करता है और दूसरा सहकारी कारण बनकर प्रकृत कार्य को पुष्ट करता है । जिस प्रकार ये दो मित्र हैं उसी प्रकार क्या सत् और परिणाम हैं ?