+ बीजांकुर भी दृष्टान्ताभास है -
नाप्युपयोगी क्वचिदपि बीजांकुरवदिहेति दृष्टान्तः ।
स्वावसरे स्वावसरे पूर्वापरभावभावित्वात्‌ ॥387॥
बीजावसरे नांकुर इव बीजं नांकुरक्षणे हि यथा ।
न तथा सत्परिणामद्वैतस्य तदेककालत्वात्‌ ॥388॥
अन्वयार्थ : बीज और अंकुर का दृष्टान्त भी सत्‌ परिणाम के विषय में उपयोगी नहीं पड़ता है, क्योंकि बीज अपने समय में होता है, अंकुर अपने समय में होता है । दोनों ही पूर्वापर भाववाले हैं अर्थात्‌ आगे पीछे होनेवाले हैं जिसप्रकार बीज के समय में अंकुर नहीं होता है और अंकुर के समय में बीज नहीं होता है, उसप्रकार सत्‌ और परिणाम में पूर्वापरभाव नहीं होता है, उन दोनों का एक ही काल है ।