
परिणामाभावेपि च सदिति च नालम्बते हि सत्तान्ताम् ।
स यथा प्रकाशनाशे प्रदीपनाशोप्यवश्यमध्यक्षात् ॥390॥
अन्वयार्थ : जिसप्रकार प्रकाश का नाश होने पर दीपक का नाश भी प्रत्यक्ष दिखता है, अर्थात् जहाँ प्रकाश नहीं रहता, वहाँ दीपक भी नहीं रहता है । उसीप्रकार परिणाम के अभाव में सत् भी अपनी सत्ता को नहीं अवलम्बन कर सकता है ।