+ क्षणभेद मानने में दोष -
अपि च क्षणभेदः किल भवतु यदीहेष्टसिद्धिरनायासात्‌ ।
सापि न यतस्तथा सति सतो विनाशोऽसतश्च सर्गः स्यात्‌ ॥391॥
अन्वयार्थ : यदि अनायास इष्ट पदार्थ की सिद्धि हो जाय तो सत्‌ और परिणाम दोनों का क्षणभेद-कालभेद भी मान लिया जाय, परन्तु कालभेद मानने से इष्ट सिद्धि तो दूर रहो उल्टी हानि होती है । दोनों का कालभेद मानने पर सत् का विनाश और असत्‌ की उत्पत्ति होने लगेगी । क्योंकि जब दोनों का काल-भेद माना जायगा तो जो है वह सर्वथा नष्ट होगा और जो उत्पन्न होगा वह सर्वथा नवीन ही होगा । परन्तु ऐसा नहीं होता, सत् का विनाश और असत् की उत्पत्ति मानने से जो दोष आते हैं उनका पहले (१० वें श्लोक में) विवेचण किया जा चुका है ।