+ कनकोपल भी दृष्टांताभास है -
कनकोपलबदिहैषः क्षमते न परीक्षितः क्षणं स्यातुम्‌ ।
गुणगुणिभावाभावाद्यतः स्वयमसिद्धदोषात्मा ॥392॥
हेयादेयविचारो भवति हि कनकोपलद्वयोरेव ।
तदनेकद्रव्यत्वान्न स्यात्साध्ये तदेकद्रव्यत्वात्‌ ॥393॥
अन्वयार्थ : सत्‌ परिणाम के विषय में कनकोपल का दृष्टांत भी ठीक नहीं है । यह दृष्टांत परीक्षा करने पर क्षण मात्र भी नहीं ठहर सकता है । सोना और पत्थर इन मिले हुये दो द्रव्यों का नाम ही कनकोपल है । इसलिये कनकोपल दो द्रव्यों के समुदाय का नाम है । कनकोपल में गुणगुणीभाव नहीं है अतः यह दृष्टान्त असिद्ध है । क्योंकि जिसप्रकार सत्‌ परिणाम में कथंचित्‌ गुणगुणीभाव है इसप्रकार इस दृष्टांत में नहीं है । दो द्रव्यों का समुदाय होने से ही कनकोपल में कुछ अंश के ग्रहण करने का और कुछ अंश के छोड़ने का विचार हो सकता है । परन्तु सत्‌ परिणाम में इसप्रकार हेय उपादेय विचार नहीं हो सकता है, क्‍योंकि वे दोनों एक द्रव्यरूप हैं । जहाँ पर दो अथवा अनेक द्रव्य होते हैं वहीं पर एक द्रव्य का ग्रहण और एक का त्याग हो सकता है परन्तु जहाँ पर केवल एक ही द्रव्य है वहाँ पर ऐसा होना असम्भव ही है । इसलिये कनकोपल का दृष्टांत सर्वथा विषम है ।