
नासिद्धं सिद्धदृष्टांताच्चेतनाऽचेतनद्वयम् ।
जीवद्वपुर्घटादिभ्यो विशिष्टं कथमन्यथा ॥4॥
अन्वयार्थ : [सिद्धदृष्टांतात्] प्रसिद्ध दृष्टांत से [चेतनाऽचेतनद्वयम्] जीव और अजीव दोनों की [नासिद्धं] असिद्धि नहीं है क्योंकि [अन्यथा] ऐसा नहीं होता तो [घटादिभ्य] घट आदि से [जीवद्वपु] जीवित शरीर [विशिष्टं कथम्] विलक्षण क्यों प्रतीत होता है ?