इति हेतुसनाथेन प्रत्यक्षेणावधारितः ।
साध्यो जीवस्स्वसिद्यर्थमजीवश्च ततोऽन्यथा ॥6॥
अन्वयार्थ : [इति] इसप्रकार [स्वसिद्यर्थम्] आत्म-सिद्धि के लिए [साध्य: जीव:] साध्यरूप जीव [हेतुसनाथेन प्रत्यक्षेण] इस पूर्वोक्त (स्व-संवेदन) प्रत्यक्षरूप हेतु सहित आत्म-प्रत्यक्ष से [अवधारित:] सिद्ध जोता है [च] और [ततोऽन्यथा अजीव:] इसके विपरीत होने से (स्व-संवेदन प्रत्यक्षरूप हेतु के अभाव में) अजीव भी सिद्ध होता है ।