नैवं यतः सुखादीनां संवेदनसमक्षतः ।
नासिद्धं वास्तवं तत्र किंत्वसिद्धं रसादिमत्‌ ॥12॥
अन्वयार्थ : [एव न] ऐसा नहीं है [यत:] क्योंकि [सुखादीनां संवेदनसमक्षतः] सुखादिकों के संवेदन रूप प्रत्यक्ष से [तत्र] उन (अमूर्त पदार्थों) में [नासिद्धं वास्तवं] वस्तुत्व (पदार्थत्व) असिद्ध नहीं है किन्तु [असिद्धं रसादिमत्‌] वे रसादिवाले हैं, यह असिद्ध है ।