+ आत्मा रसादिक से भिन्न है -
तद्यथा तद्रसज्ञानं स्वयं तन्न रसादिमत्‌ ।
यस्माज्ज्ञानं सुखं दुःखं यथा स्यान्न तथा रसः ॥13॥
अन्वयार्थ : ऊपर के श्लोक में रसादिक आत्मा से भिन्न ही बतलाये हैं । उसी बात को यहाँ पर खुलासा करते हैं । आत्मा में जो रस का ज्ञान होता है वह ज्ञान ही है । रस ज्ञान होने से ज्ञान रसवाला नहीं हो जाता है क्योंकि रस पुद्गल का गुण है वह जीव में किस तरह आ सकता है । यदि रस भी आत्मा में पाया जाता तो जिसप्रकार ज्ञान, सुख, दुःख का अनुभव होने से ज्ञानी, सुखी, दुःखी आत्मा बन जाता है उसीप्रकार रसमयी भी हो जाता परन्तु ऐसा नहीं हैं ।