
नासिद्धं सुखदुःखादि ज्ञानानर्थान्तरं यतः ।
चेतनत्वात् सुखं दुःखं ज्ञानादन्यत्र न क्वचित् ॥14॥
अन्वयार्थ : सुख-दुःख आदिक जो भाव हैं वे ज्ञान से अभिन्न हैं अर्थात् ज्ञान स्वरूप ही हैं । क्योंकि चेतन भावों में ही सुख दु:ख का अनुभव होता है ज्ञान को छोड़कर अन्यत्र कहीं सुख दुःखादिक का अनुभव नहीं हो सकता ।