न पुन: स्वैरसन्चारि सुखं दुखं चिदात्मानि ।
अचिदात्मन्यपि व्याप्तं वर्णादौ तदसम्भवात्‌ ॥15॥
अन्वयार्थ : ऐसा नहीं है कि सुख दुःख भाव जीव और अजीव दोनों में ही स्वतंत्रता से व्याप्त रहें । किन्तु ये भाव जीव के ही हैं । वर्णादिक में इस भावों का होना असंभव है ।