नैवं यतो रसाद्यर्थं ज्ञानं तन्न रसः स्वयम्‌ ।
अर्थाज्ज्ञानममूर्तं स्यान्मूर्तं मूर्तोपचारतः ॥ 19॥
अन्वयार्थ : ऊपर जो शंका उठाई गई है वह ठीक नहीं है । क्योंकि जो रसादि पदार्थों का ज्ञान होता है वह स्वयं रस रूप नहीं हो जाता अर्थात्‌ ज्ञान ज्ञान ही रहता है और वह अमूर्त ही है । यदि उस ज्ञान को मूर्त कहा जाता है तो उस समय केवल उपचार-मात्र ही समझना चाहिये ।