
न पुनः सर्वथा मूर्तं ज्ञानं वर्णादिमद्यत: ।
स्वसंवेद्याद्य भावः स्यात्तन्जडत्वानुषंगतः ॥20॥
अन्वयार्थ : ज्ञान उपचार-मात्र से तो मूर्त है परन्तु वास्तव में मूर्त नहीं है । वह वर्णादिक को विषय करनेवाला है इसीलिये उसमें उपचार है । यदि वास्तव में ज्ञान मूर्त हो जाय तो पुद्गल की तरह ज्ञान में जड़पना भी आ जायगा, और ऐसी अवस्था में स्व-संवेदन आदिक का अभाव ही हो जायेगा ।